Demonetisation: ठीक पांच साल बाद देश में कैसा रहा नोटबंदी का सफर

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देश में जो नोटबंदी हुई थी, उसको 5 साल हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 की रात आठ बजे इसकी घोषणा की थी और यह उसी रात 12 बजे से लागू हो गया थी। नोटबंदी का सबसे बड़ा मकसद आतंकवादियों एवं उन्हें वित्तीय मदद देने वालों की कमर तोड़ना था। इसके अलावा भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना एवं लोगों को अधिक से अधिक डिजिटल पेमेंट के लिए जागरूक करना था। पांच साल बाद नोटबंदी का सकारात्मक असर एकदम साफ तौर पर देखा जा रहा है। मैक्सिमम लोग डिजिटल पेमेंट की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। हालांकि इसका एक असर यह भी देखने को मिल रहा है कि वित्तीय लेनदेन में जो पारदर्शिता नोटबंदी के बाद देखने को मिल रही हैं। वह इससे पहले कभी नहीं दिखाई दी थी।

भुगतान में वृद्धि क्या नोटबंदी के बाद से हुई है?

अब सवाल यह भी है कि क्या भारत नोटबंदी के बाद से एक कैशलेस अर्थव्यवस्था बन गया है? दरअसल नोटबंदी के 1 साल पहले 2015-2016 जीडीपी के 12.1 प्रतिशत हिस्से वाले नोट चलन में थे। जो 2016-2017 में कम होकर 8.7 प्रतिशत हो गए। वजह यह थी कि बैंकिंग प्रणाली नोटबंदी के बाद सिस्टम में कैश वापसी के लिए संघर्ष कर रही थी। गौरतलब है कि इसके बाद से यह आंकड़ा बढ़ता ही गया, यानी कि कैश की संख्या लगातार बढ़ती रही है। यहां सन् 2019-20 में 12 प्रतिशत तक पहुंच गया। के बाद से यह आंकड़ा 2020-21 में 14.5 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मूल्य के हिसाब से 4 नवंबर 2016 को 17.74 लाख करोड़ रुपए के नोट चलन में थे। जोकि 29 अक्टूबर 2021 को बढ़कर 19.17 लाख करोड़ रुपए हो गए। इसका कारण यह है कि कोरोना महामारी के दौरान बहुत सारे लोगों ने सचेत रहते हुए काफी नकदी निकाली ताकि उन्हें आगे चलकर किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

डिजिटल ट्रांजैक्शन में भी हुई बढ़ोत्तरी

एक न्यूज़ एजेंसी के रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन भी बड़ा है। क्रेडिट कार्ड-डेबिट कार्ड, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस, नेट बैंकिंग सभी तरीकों से डिजिटल पेमेंट बढ़ा है। सन् 2016 में यूपीआई की शुरुआत हुई थी। अक्टूबर 2021 में इससे लगभग 7.71 लाख करोड़ रुपए मूल्य का लेनदेन हुआ।

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