

Chauri Chaura
Chauri Chaura: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज बनारस के डी ए वी पीजी कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम चौरी-चौरा शताब्दी में शामिल हुए। बता दें कि योगी आदित्यनाथ इस वक्त वाराणसी में हैं । वह कुछ कार्यक्रमों में शामिल होने के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आगामी दौरे को लेकर की जा रही तैयारियों की भी समीक्षा करेंगे। महर्षि दयानंद एंग्लो वैदिक महाविद्यालय,वाराणसी में आयोजित चौरी चौरा शताब्दी कार्यक्रम में CM योगीजी बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए हैं ।
प्रसिद्ध चौरी चौरा कांड के 100 वर्ष पूरे होने पर यह कार्यक्रम रखा गया है । इस कार्यक्रम के तहत महाविद्यालय प्रशासन ने एक नाट्य प्रदर्शन आयोजित किया जिसका विषय चौरी चौरा- अपराजेय समर था । इसके तहत कालेज के करीब 40 छात्र-छात्राएं ऐतिहासिक चौरी चौरा कांड का नाट्य दृश्यांकन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित योगी आदित्यनाथ और विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर मौजूद राज्यमंत्री डॉ दयाशंकर मिश्रा के समक्ष किया।
इस मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 4 फरवरी 1922 को घटित हुई घटना को याद करते हुए कहा – “मैं चौरी- चौरा कांड के शहीदों को नमन करता हूँ जिन्होंने भारत को आजादी दिलाने में इस कांड के जरिये महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ” उन्होंने आगे कहा- हमारा सौभाग्य है कि हम अंग्रेजों की पराधीनता की बेड़ियों से निकलकर आने में सफल हुए हैं और आज आजादी के 75 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं।”
तो चलिए इसी बहाने हम इतिहास की उस घटना को याद कर लेते हैं जिसके होने ने तो भारत के इतिहास को बदला ही यदि यह घटना न होती तो शायद देश का इतिहास कुछ और होता।
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विचारों का दमन हिंसात्मक मार्ग की ओर ले जाता है । काश इसका इल्म चौरी चौरा थाने के तब के दरोगा रहे गुप्तेश्वर सिंह को भी होता तो शायद यह इतनी बड़ी घटना घटती ही नहीं । गाँधीजी के असहयोग आंदोलन की चर्चा तब पूरे देश मे थी। लोग इस आंदोलन के लिए हरसंभव तरीके से मदद कर रहे थे । चौरा गांव में लगने वाली हाट भी इससे अछूती नहीं थी जहां क्रांतिकारियों ने विदेशी सामान और पराधीनता में जकड़ने वाली हर एक वस्तु का विरोध करना शुरू कर दिया था।
बाजार में घूम घूमकर लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जा रहा था कि गुलामी से निकलना है तो गुलामी बन्द करनी होगी। लोगों को स्वदेशी वस्तुओं के प्रति जागरूक किया जा रहा था और यही एक चीज ऐसी थी जो ब्रिटिश शासन की आंखों में खटक रही थी ।
असहयोग आंदोलन से आजादी की अलख तो जग ही चुकी थी। तमाम क्रांतिकारी इस अलख को हरसंभव तरीके से एक दूसरे के मार्फ़त आगे बढाने में जुटे हुए थे कि इसी विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए ब्रिटिश पुलिस ने 2 फरवरी 1922 को 2 क्रांतिकारियों को पकड़ लिया। यह बड़ी घटना थी लेकिन इतनी नहीं कि इतिहास में दर्ज हो जाये । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियां तो होती ही थीं इसमें कुछ नया नहीं था ।
नया था दरोगा गुप्तेश्वर सिंह का सरेआम क्रांतिकारी भगवान अहीर को लाठियों से पीटना। यह ऐसी घटना थी जिसने क्रांति का बीड़ा उठाये आजादी के मतवालों के सीधा आत्म सम्मान पर चोट किया। कुछ इतिहासकारों की मानें तो 1 फरवरी 1922 की इस घटना ने ही चौरी चौरा कांड को जन्म दिया।
तो बात बस इतनी थी कि पुलिस वालों ने 2 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था जिसके विरोध में जनता सड़कों पर उतर कर विरोध दर्ज करवा रही थी। करीब 4 हजार लोगों की भीड़ जब थाने पहुंची और नारेबाजी करने लगी तो दरोगा गुप्तेश्वर सिंह ने बजाय समझाने बुझाने के सीधे जनता पर नालें ही तनवा दी। पहले हवाई फायरिंग की गयी । जब लगा कि जनता विरोध करना बंद नहीं करेगी तो सीधा फायरिंग शुरू कर दी । पुलिस फायरिंग में 3 लोग मारे गए ।
हजारों में जनता सामने खड़ी हो तो बंदूकों से बात नहीं बनती । काश चौरा थाने के दरोगा यह उस वक्त समझ जाते । फिर वही हुआ जो ऐसे मामलों में होता है । विरोध कर रही जनता अपने साथियों का खून देखकर गुस्से से उबल पड़ी। इधर पुलिस वालों के भी कारतूस खत्म हो गए और वह थाने के अंदर जाकर छिप गए। गुस्साई जनता ने थाने पर हमला बोल दिया और पूरा थाना ही आग के हवाले कर दिया । थाने में दरोगा सहित 23 पुलिसकर्मियों की जलकर मृत्यु हो गयी ।
इतनी बड़ी घटना ने अचानक देश मे हलचल पैदा कर दी । जहां असहयोग आंदोलन की शुरुआत कर गाँधीजी देश को जल्द से जल्द आजाद करवाना चाहते थे वहीं इस घटना ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया और उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया । हालांकि उनके इस फैसले ने साथी क्रांतिकारियों को निराश जरूर किया और क्रांतिकारी दो भागों( नरम-गरम दल) में बंट गए । जहां थाना जलाने और 23 पुलिसकर्मियों को जलाकर मारे जाने की घटना की गांधी जी ने निंदा की वहीं पुलिस द्वारा क्रांतिकारियों के दमन को भी गलत ठहराया । बहरहाल 4 फरवरी 1922 की यह घटना चौरी चौरा कांड के रूप में दर्ज हुई ।
इस घटना के बाद ब्रिटिश शासन की नींव हिल गई। आंदोलन में शामिल 222 लोगों को ब्रिटिश सरकार ने आरोपी बनाया । क्रांतिकारियों की तरफ से महामना मदन मोहन मालवीय ने केस लड़ा । वह जितने लोगों को हो सकता था बचा ले गए। 222 में से 200 से ऊपर लोगों को वह छुड़ाने में कामयाब रहे लेकिन भगवान अहीर सहित 19 लोगों को ब्रिटिश शासन ने फांसी की सजा सुनाई । 2-11 जुलाई के बीच इन 19 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गयी । तब से ही चौरी चौरा कांड इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।
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गोरखपुर के Chauri Chaura कांड के बाद शहीद पुलिसकर्मियों की याद में तो स्मारक बन गया था किंतु शहीद हुए क्रांतिकारियों के याद में कोई स्मारक नहीं बना। 70 के दशक में स्थानीय निवासियों ने खुद से चंदा कर स्मारक बनवाया । हालांकि बाद में सरकार ने यहाँ गेट आदि लगवा दिए। चौरी चौरा कांड ने इतिहास को कई सबक दिए हैं ।